के बोलो ना मित्र मैं क्या करूं?
आरती के थाल सजाउ
फूलों की लारियाँ लगाऊ
हल्दी कुमकुम का तिलक करूं
या अपने आसूंओ को बह जाने दूं
के बोलो ना मित्र मैं पहले क्या करूं?
पहले अपनी यह कविता सुनाऊँ
तुम्हारे स्वागत में मल्हार गान गाऊँ
तुम्हारे आने की खबर मैं सब को बताऊँ
या सबसे पहले तुमको गले लगाऊँ
के बोलो ना मित्र मैं पहले क्या करूं?
तुम्हारे साथ मंदिर जाऊं
तुम्हारे लिए बहुत से उपहार लाऊँ
तुम्हे याद करके बिठाए दिन गिनाऊँ
या इन् दिनों में घटित साड़ी व्यथा सुनाऊँ
के बोलो ना मित्र मैं पहले क्या करूं?
ऐसा करता हूँ, प्रभु के पास जाता हूँ
अपनी भक्ति प्रकट करके अपनी समस्या सुनाता हूँ
हाथ जोर के विनती करता हूँ
के वर मैं ये पाऊँ, अपने मित्र के आने पे इस दुविधा में ना फस जाऊं
घबराऊँ ,हद्बदाऊँ , परेशान हो जाऊं एवं पूछूं
के आज प्रभु तुम्ही बताओ
के पहले मैं क्या करूं?
जी करता है की हृदय अपना चीर क रख दूं
फिर उसमें से एक एक कर सारी यादें दिखाऊँ
या ख़ुशी से पागल हो कर खुद भी नाचूं और तुम्हे भी नचाऊँ
पर इस दुविधा से निजात मैं पाऊँ
के बोलो ना मित्र मैं पहले क्या करूं?
भाग्य पे नाज़ करूं या इश्वर का धन्यवाद् करूं?
या जितने दिन नहीं मिल पाए हम उसपर बैठ कर विषाद करूं
इस बात पर पुनः पुनः विचार पात करूं
या बिना कुछ कहे -किये सिर्फ तुम्हारे आने का हर्ष प्राप्त करूं
के बोलो ना मित्र मैं पहले क्या करूं?
© सहर्ष भूषण
20/10/2011
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